अप्रतिम कविताएँ
काश हम पगडंडियाँ होते
यों न होते
काश !
हम पगडंडियाँ होते

इधर जंगल - उधर जंगल
बीच में हम साँस लेते
नदी जब होती अकेली
उसे भी हम साथ देते

कभी उसकी
देह छूते
कभी अपने पाँव धोते

कोई परबतिया
इधर से जब गुज़रती
घुघरुओं की झनक
भीतर तक उतरती

हम
उसी झंकार को
आदिम गुफाओं में सँजोते

और-भी पगडंडियों से
उमग कर हम गले मिलते
तितलियों के संग उड़ते
कोंपलों के संग खिलते

देखते हम
कहाँ जाती है गिलहरी
कहाँ बसते रात तोते
- कुमार रवीन्द्र
विषय:
प्रकृति (41)
सहजता (8)

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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