तैर रहा इतिहास नदी में
तैर रहा है
यहाँ, बंधु, इतिहास नदी में

खँडहर कोट-कँगूरे तिरते उधर मगध के
इधर लहर लेकर आई है अक़्स अवध के

काँप रही है
उनकी बूढ़ी साँस नदी में

डोल रहा है महाबोधि बिरवे का साया
वहीँ तिर रही कल्पवृक्ष की भी है छाया

घोल रहे वे
सदियों की बू-बास नदी में

कहीं अहल्या कहीं द्रोपदी की परछाईं
सिया-राम की झलक अभी दी उधर दिखाई

लहर रहा है
पुरखों का विश्वास नदी में
- कुमार रवीन्द्र
बिरवा : पेड़

काव्यालय को प्राप्त: 7 Dec 2018. काव्यालय पर प्रकाशित: 4 Jan 2019

***
कुमार रवीन्द्र
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ

 अभी होने दो समय को
 काश हम पगडंडियाँ होते
 तैर रहा इतिहास नदी में
 बक्सों में यादें
 मित्र सहेजो
 सुन सुलक्षणा
इस महीने :

'कॉरोना काल का प्रेम गीत'
अमृत खरे


यह प्रतीक्षा की घड़ी है,
तुम उधर असहाय, हम भी हैं इधर निरुपाय
उस पर
बीच में दुविधा अड़ी है!
यह प्रतीक्षा की घड़ी है!

यूँ हुए अभिशप्त,
अर्जित पुण्य
हो निष्फल गए हैं,
स्वर्ग से लाये धरा पर
सूख सब
परिमल गए हैं,

यह समीक्षा की घड़ी है ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
इस महीने :

'समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न'
विनोद तिवारी


विनोद तिवारी की कविताओं का संकलन
काव्यालय का पुस्तक प्रकाशन
वाणी मुरारका की चित्रकला के संगे
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
आपकी कविता | सम्पर्क करें | हमारा परिचय

a  MANASKRITI  website