अप्रतिम कविताएँ

व्यथा जी उठी
अचेत की धूल में गढ़ी,
जंग से मढ़ी,
बरसों पहले की व्यथा,
मौन थी, सुप्त थी।
अपने आपको लपेटे थी।
चेतन ने उसे गाड़ा था यहाँ,
सँभाल न पा रहा था, अपने यहाँ।
उस दिन किसी ने,
अनजाने में
उसे छू लिया,
तो वह कराह उठी,
कुलबुला उठी,
मृत व्यथा
फिर जीवित हो गयी थी।
चेतन ने भी
उसके जी उठने पर
कुछ अश्रु-बूँदें
बहायी थीं।
- गीता मल्होत्रा
विषय:
उदासी (19)
अन्तर्मन (14)

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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