अप्रतिम कविताएँ
तबीयत से उछालो यारो
यह जो शहतीर है पलकों पे उठा लो यारो,
अब कोई ऐसा तरीक़ा भी निकालो यारो।

दर्दे दिल वक़्त को पैग़ाम भी पहुँचाएगा,
इस क़बूतर को ज़रा प्यार से पालो यारो।

लोग हाथों में लिए बैठे हैं अपने पिंजरे,
आज सय्याद को महफ़िल में बुला लो यारो।

आज सीवन को उधेड़ो तो ज़रा देखेंगे,
आज संदूक से वे ख़त तो निकालो यारो।

कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता,
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो।

लोग कहते थे कि ये बात नहीं कहने की,
तुमने कह दी है तो कहने की सज़ा लो यारो।
- दुष्यन्त कुमार
शहतीर : लम्बी लकड़ी, लठ्ठ; सय्याद : शिकारी; सीवन : सिलाई ; सूराख़ : छेद

काव्यालय पर प्रकाशित: 14 Oct 2022

***
सहयोग दें
विज्ञापनों के विकर्षण से मुक्त, काव्य के सौन्दर्य और सुकून का शान्तिदायक घर... काव्यालय ऐसा बना रहे, इसके लिए सहयोग दे।

₹ 500
₹ 250
अन्य राशि
दुष्यन्त कुमार
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ

 इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है
 एक आशीर्वाद
 तबीयत से उछालो यारो
 हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस महीने :
'कहीं कुछ भी उथला न रह जाए'
ज्योति चावला


इन दिनों मैं डूब-उतरा रही हूँ
अपने ही भीतर के पानी में
ऐसे जैसे एक प्याला हो मेरी देह और
चाय पत्ती के सैशे-सा मेरा व्यक्तित्व
डूब और उतरा रहा है अपने ही भीतर कहीं

न जाने क्यूँ जितनी बार उबरती हूँ खुद से
फिर-फिर डूब जाना चाहती हूँ खुद में ही
कि सदियाँ गवाह हैं ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'तोड़ती पत्थर'
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'


वह तोड़ती पत्थर;
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर—
वह तोड़ती पत्थर।

कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;
श्याम तन, भर बँधा यौवन,
नत नयन प्रिय, कर्म-रत मन,
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
सम्पर्क करें | हमारा परिचय
सहयोग दें

a  MANASKRITI  website