आप सुन तो रहें हैं
मेरे गीत यह,
मन के मन्दिर में दीपक
जलाये तो हैं
आपके सामने बैठ कर
अनगिनत, अश्रु पावन
नयन से गिराये तो हैं
नेह की डालियों से
सुगन्धित सुमन
सांवरे श्री चरण पर
चढ़ाये तो हैं
मेरी पूजा में रोली
न चन्दन प्रिय
भाल पर प्रेम अक्षत
लगाये तो हैं
क्यों मैं घंटा ध्वनि से
जगाऊं तुम्हें
साज, सरगम के स्वर
गुनगुनाये तो हैं
भूल न जाना कभी
यह तुच्छ भक्ति मेरी
भाव कविता में गढ़
कर सुनाये तो हैं
यह जन्म आपके
रंग में रंग लिया
स्वप्न अगले जन्म के
सजाये तो हैं।
हर पल वीडियो दिखाकर फुसलाते जाना
और यूंँ कौरों का हलक से उतरते जाना
कभी वायलिन पकड़ना, कभी झटक के रख देना
रूठना- मचलना- न नहाने की ज़िद करते रहना
कातर नजरों से मेरे हुक्म को सिर्फ तकते रहना
..
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।