कैसा परिवर्तन
प्रकृति मौन हो देख रही है
आज समय का परिवर्तन
मृत्यु खेलती है आंगन में
करती है भीषण नर्तन।
झंझावातों में मनुष्य का
साहस संबल टूट गया
भूल गया सब खेल अनोखे
भूल गया पूजा अर्चन।
कैद हुआ है घर में मानव
जीवन का क्रम भूल गया
स्वयं समय से पूछ रहा है
कैसा है यह परिवर्तन।
दौड़ रहा हर नर अब घर को
रोजी अपनी भूल गया
पुनः पुरानी माटी से ही
जोड़ रहा टूटे बंधन।
अन्नपूर्णा धरती माँ के
रोते चिल्लाते बच्चे
भूख से मारे मारे फिरते
कैसा है जीवन दर्शन।
जान हथेली पर ले देवता
श्वेत वस्त्र में आये हैं
शायद किसी औषधि से बच
जाए जीवन हो नूतन ।
करुणानिधि भी चुप बैठे हैं
क्यों करुणा में देर हुई
करुण पुकारें हिला न पाई
क्यों श्री जी का सिंहासन।
काव्यालय को प्राप्त: 2 May 2020.
काव्यालय पर प्रकाशित: 8 May 2020
इस महीने :
'बन्धन दूँ क्यों'
शान्ति मेहरोत्रा
चिर मुक्ति न दे पायी जिसको, उसको फिर बन्धन दूँ तो क्यों?
मधुमय प्रभात की बेला में,
रवि ने संध्या का किया मोल;
तब कमल दलों ने भंवरों को,
निज बन्दीगृह से दिया खोल;
तो भी मेरे भोले बन्दी!
तुम भी निज को आजाद करो;
फिर साहस लेकर एक बार,
सूनी कुटिया आबाद करो!
मैं आत्म-समर्पण कर न सकी, झूठा अभिनन्दन दूँ तो क्यों?
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भावुकता और पवित्रता

भाव-रस के लिए हमारे हृदय में एक स्वाभाविक लोभ होता है। काव्य और शिल्पकला से, गल्प, गान और अभिनय से,
भाव-रस का उपभोग करने का आयोजन हम करते रहते हैं।
प्राय: उपासना से भी हम भाव-तृप्ति चाहते हैं। कुछ क्षणों के लिए एक विशेष रस का आभोग करके हम यह सोचते
हैं कि हमें कुछ लाभ हुआ। धीरे-धीरे इस भोग की आदत एक नशा...
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इस महीने :
'नफ़रत'
विस्सावा शिंबोर्स्का
देखो, तो अब भी कितनी चुस्त-दुरुस्त और पुरअसर है
हमारी सदी की नफ़रत,
किस आसानी से चूर-चूर कर देती है
बड़ी-से-बड़ी रुकावटों को!
किस फुर्ती से झपटकर
हमें दबोच लेती है!
यह दूसरे जज़्बों से कितनी अलग है --
एक साथ ही बूढ़ी भी और जवान भी।
यह खुद
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