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धत्
सीधा
मेरी आँखों में
बेधड़क घूरती
बिल्ली सा
वह एक
निडर ख़्याल तेरा
टाँगों के बीच
पूँछ दबा
मेरी एक धत् से
भाग लिया।
-
दिव्या माथुर
Divya Mathur
email:
[email protected]
विषय:
अन्तर्मन (14)
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धत्
नृत्य
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..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर
टीलों पर मन्दिर हों
और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ --
मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो
।
मेरा बदन काट कर नहरें
सभी को पोषण पहुँचाएँ।
देखिए
शिव बहादुर सिंह भदौरिया
की कविता
"नदी का बहना मुझमें हो"
पर
विशेष प्रस्तुति
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