चीख
रात हो जाती है जब, घनी स्याह
तूफ़ान समुन्दर में उठते हैं अथाह
उस पहर जब
जिन्दा भी मुर्दों की श्रेणी में आते हैं
मरहम से सपने नींद सजाते हैं
महसूस होता है एक साया
जिस्म पर हाथ फेरता
चूड़ियाँ तब भी टूटती हैं
दर्द की वो भी पराकाष्ठा है
मगर चीख जिस्म से
बाहर नही निकलती
क्योंकि -
उसके पास "सर्टिफिकेट" है
- पारुल 'पंखुरी'
Parul 'Pankhuri'
Email : [email protected]
Parul 'Pankhuri'
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पारुल 'पंखुरी'
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 कविता उम्मीद से है
 चीख
इस महीने :
'स्वीकार करो यह प्रार्थना '
शरद कुमार


हे प्रभु अब हिम्मत और विश्वास रख पाने का बल दो
काल के पंजों को रोक जीवन का अमृत विमल दो

भय से है आक्रांत मानव लाश ढोते थक गया है
निर्भय करो अपनी कृपा से मन में आशाएं प्रबल दो

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
हम खड़े हो जाएँ अपनी बेड़ियों को तोड़ कर।
रोशनी की ओर चल दें तीरगी को छोड़ कर।
ख़त्म जब हो जाएंगी माज़ी की सब रुस्वाइयाँ,
खुद-बख़ुद मुड़ जाएगा यह वक़्त अगले मोड़ पर।

~ विनोद तिवारी

संकलन "समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न" में कविताओं के बीच बीच कई मुक्तक भी हैं, जैसे कि यह

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