अप्रतिम कविताएँ
365 सिक्के

तीन सौ पैंसठ
सिक्के थे गुल्लक में
कुछ से मुस्कुराहटें खरीदीं
कुछ से दर्द,
कुछ से राहतें,
कुछ खर्चे खींचातानी में
कुछ रूठने मनाने में,
कुछ दे दिए दूसरों की
मुस्कान के लिए,
कुछ खोटे सिक्के
भी थे उसमें,
बाँध के रख लिया उन्हें
आँचल के कोने में
बीते साल की निशानी की
पहचान के लिए।
- पारुल 'पंखुरी'
काव्यपाठ: पारुल 'पंखुरी'
Parul 'Pankhuri'
Email : [email protected]
विषय:
बीता समय (18)
समय (7)

काव्यालय को प्राप्त: 2 Feb 2025. काव्यालय पर प्रकाशित: 19 Dec 2025

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 365 सिक्के
 कविता उम्मीद से है
 चीख
इस महीने :
'न्यूज़ चैनल'
प्रियदर्शन


यहाँ त्रासदियाँ
प्रहसन में बदली जाती हैं,
भाषा तमाशे में
और लोग कठपुतलियों में।
तबाहियों की खुराक
इसका पेट भरती है।
बहुत मनोयोग से
किया जाता है
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'राम की जल समाधि'
भारत भूषण


पश्चिम में ढलका सूर्य उठा वंशज सरयू की रेती से,
हारा-हारा, रीता-रीता, निःशब्द धरा, निःशब्द व्योम,
निःशब्द अधर पर रोम-रोम था टेर रहा सीता-सीता।

किसलिए रहे अब ये शरीर, ये अनाथमन किसलिए रहे,
धरती को मैं किसलिए सहूँ, धरती मुझको किसलिए सहे।
तू कहाँ खो गई वैदेही, वैदेही तू खो गई कहाँ,
..

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इस महीने :
'रंग और मैं'
आशा जैसवाल


बड़े निराले होते हैं,
जीवन के ये रंग।
कभी उषा की लालिमा
बन कर मन में
आशाओं के कमल
खिला जाते हैं
तो कभी
निराशा की ... ..

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