अप्रतिम कविताएँ
सुकूने-दिल
तरस जाती हैं सुनने को
                 किसी की...

न जाने कब किसी से
           क्यूँ कहा हमने
सुकूने-दिल की बातें हैं
वो यादें तुम्हारी
           कि तुम्हारे दिल
           में होगी कभी
           चर्चा हमारी भी
- रणजीत मुरारका
विषय:
प्रेम (63)
बीता समय (18)

काव्यालय को प्राप्त: 27 Mar 2020. काव्यालय पर प्रकाशित: 24 Jul 2020

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कुछ खोयी-सी, कुछ अबूझ
कुछ खुश, कुछ घबराई थी

गोल-मटोल, चार पैर पर
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..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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