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विनोद तिवारी
काव्य संकलन समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न


विनोद तिवारी की काव्यालय पर रचनाएँ
ऐसी लगती हो
जीवन दीप
दुर्गा वन्दना
प्यार का नाता
प्रवासी गीत
प्रेम गाथा
मेरी कविता
मेरे मधुवन
यादगारों के साये

विनोद तिवारी की आवाज़ में अन्य कवियों की रचनाएँ
अमर स्पर्श - सुमित्रानंदन पंत
चाँद और कवि - रामधारी सिंह 'दिनकर'
पुष्प की अभिलाषा - माखनलाल चतुर्वेदी
प्रयाणगीत - जयशंकर प्रसाद
बरसों के बाद कहीं - गिरिजाकुमार माथुर
बीती विभावरी जाग री! - जयशंकर प्रसाद
रात आधी खींच कर मेरी हथेली - हरिवंशराय बच्चन
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए - दुष्यन्त कुमार
डा. विनोद तिवारी हरदोई, उत्तर प्रदेश के मूल निवासी हैं। आज कल कोलोराडो, अमरीका में रहते हैं। एक राष्ट्रीय वैज्ञानिक संस्थान में वैज्ञानिक के रूप में कार्यरत हैं। उनकी पत्नी अवकाश प्राप्त शिक्षिका हैं और उनकी दो पुत्रियाँ कैलिफ़ोर्निया में अपने परिवार के साथ रहती हैं।

अमरीका आने के पहले वह बिड़ला इंस्टीटूट पिलानी में प्राध्यापक और डीन थे। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से भौतिक विज्ञान में बीएस सी और एम.एस सी. और दिल्ली विश्विद्यालय से पी एच. डी. किया है। भौतिक विज्ञान में शोध कार्य के लिये उन्हें एरिक राइस्नर पदक, अमरीका सरकार का कांस्य पदक, प्राइड आफ इंडिया पुरस्कार, और लाइफ-टाइम-एचीवमेंट पुरस्कार मिल चुके हैं।
समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न

हिन्दी काव्य लेखन और पठन में उन्हें विशेष रुचि है। तुलसीदास, ग़ालिब, साहिर, और निराला उनके विशेष प्रिय कवियों में से हैं। डा. तिवारी की कवितायें सरिता, कादम्बिनी, और अन्य पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। अनुभूति के प्रतिष्ठित संकलन "हिन्दी की 100 सर्वश्रेष्ठ प्रेम कवितायें" में भी उनकी कविता प्रकाशित हुई है। उन्हें कविता अपने माता पिता से विरासत में मिली। उन्होंने अपनी पहली कविता सात वर्ष की आयु में लिखी थी। लगभग दस वर्ष की आयु में उनके स्कूल के हिंदी अध्यापक ने उन्हें काव्य रचना सिखायी और मात्राओं का महत्व समझाया। अध्यापक जी की मुख्य शिक्षा, जो डा. तिवारी युवा कवियों के साथ आज भी बाँटते हैं, यह थी कि कविता लिखना देवी सरस्वती की साधना है। कवि के लिए आवश्यक है कि कविता की पवित्रता का संम्मान करे। उन्ही के निर्देशन में डा. तिवारी ने पहली कविता लिखी जो प्रकाशन योग्य थी। यह कविता उस समय की प्रमुख बाल पत्रिका "बाल विनोद" (गंगा पुस्तक माला प्रकाशन) में प्रकाशित हुयी थी। इसके लिए उन्हें दो रुपये पुरस्कार में मिले थे जिसे याद करके आज भी उनके मुख पर मुस्कान चमक जाती है।

कविता के अतिरिक्त उन्होंने कहानियां भी लिखी है जो सरिता और नीहारिका में प्रकाशित हो चुकी हैं। सरिता द्वारा आयोजित साहसिक कहानी प्रतियोगिता में उन्हें प्रथम पुरस्कार मिला था।

सन 2001 से वह वाणी मुरारका के सहयोग में काव्यालय का सम्पादन कर रहे हैं। उनके अपने शब्दों में, काव्यालय उनके लिए अभिव्यक्ति का साधन ही नहीं, एक व्यक्तिगत उपलब्धि है जिसके लिए वह काव्यालय की संस्थापिका वाणी मुरारका के प्रति कृतज्ञ अनुभव करते है।

संक्षेप में उनके व्यक्तित्व की परिभाषा है, "भौतिक विज्ञान पर अडिग आस्था, हिन्दी से अटूट अपनत्व, और काव्य में असीम रुचि।"

ईमेल: [email protected]


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