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दुर्गा वन्दना
जय जय जय जननी। जय जय जय जननी।

      जय जननी, जय जन्मदायिनी।
      विश्व वन्दिनी लोक पालिनी।
      देवि पार्वती, शक्ति शालिनी।

जय जय जय जननी। जय जय जय जननी।

      परम पूजिता, महापुनीता।
      जय दुर्गा, जगदम्बा माता।
      जन्म मृत्यु भवसागर तरिणी।

जय जय जय जननी। जय जय जय जननी।

      सर्वरक्षिका, अन्नपूर्णा।
      महामानिनी, महामयी मां।
      ज्योतिरूपिणी, पथप्रदर्शिनी।

जय जय जय जननी। जय जय जय जननी।

      सिंहवाहिनी, शस्त्रधारिणी।
      पापभंजिनी, मुक्तिकारिणी।
      महिषासुरमर्दिनी, विजयिनी।

जय जय जय जननी। जय जय जय जननी।
- विनोद तिवारी
काव्यपाठ: पारुल 'पंखुरी'
काव्य संकलन समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न

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विनोद तिवारी
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इस महीने :
'धूप का टुकड़ा'
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सुनो!
आज पूरे दिन मैं भागता रहा
धूप के एक टुकड़े के पीछे,
सुबह सवेरे खिड़की से झाँक रहा था
तो मैं उसे पकड़ कर बैठ गया

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इस महीने :
'कच्ची-कच्ची धूप'
कल्पना मनोरमा


सरसों के दामन से लिपटी
मन से कच्ची-कच्ची धूप ।।

बूढ़ा जाड़ा मोहपाश में
दिन को जकड़े रहता
काँख गुदगुदी करता सूरज
दिन किलकारी भरता

कभी फिसलती कभी सम्हलती
करती माथा-पच्ची धूप ।।
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'नया वर्ष'
अज्ञात


नए वर्ष में नई पहल हो
कठिन ज़िंदगी और सरल हो
अनसुलझी जो रही पहेली
अब शायद उसका भी हल हो
... ..

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