दुर्गा वन्दना
जय जय जय जननी। जय जय जय जननी।

      जय जननी, जय जन्मदायिनी।
      विश्व वन्दिनी लोक पालिनी।
      देवि पार्वती, शक्ति शालिनी।

जय जय जय जननी। जय जय जय जननी।

      परम पूजिता, महापुनीता।
      जय दुर्गा, जगदम्बा माता।
      जन्म मृत्यु भवसागर तरिणी।

जय जय जय जननी। जय जय जय जननी।

      सर्वरक्षिका, अन्नपूर्णा।
      महामानिनी, महामयी मां।
      ज्योतिरूपिणी, पथप्रदर्शिनी।

जय जय जय जननी। जय जय जय जननी।

      सिंहवाहिनी, शस्त्रधारिणी।
      पापभंजिनी, मुक्तिकारिणी।
      महिषासुरमर्दिनी, विजयिनी।

जय जय जय जननी। जय जय जय जननी।
- विनोद तिवारी
काव्यपाठ: पारुल 'पंखुरी'
काव्य संकलन समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न

***
विनोद तिवारी
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ

 ऐसी लगती हो
 जीवन दीप
 दुर्गा वन्दना
 प्यार का नाता
 प्रवासी गीत
 प्रेम गाथा
 मेरी कविता
 मेरे मधुवन
 यादगारों के साये
इस महीने :
'स्वीकार करो'
भगवती चरण वर्मा


अर्पित मेरी भावना-- इसे स्वीकार करो ।

तुमने गति का संघर्ष दिया मेरे मन को,
सपनों को छवि के इन्द्रजाल का सम्मोहन;
तुमने आँसू की सृष्टि रची है आँखों में
अधरों को दी है शुभ्र मधुरिमा की पुलकन।

उल्लास और उच्छ्वास तुम्हारे ही अवयव
तुमने मरीचिका और तृषा का सृजन किया,
अभिशाप बनाकर तुमने मेरी सत्ता को
मुझको पग-पग पर मिटने का वरदान दिया,
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'छापे माँ तेरे हाथों के'
शार्दुला झा नोगजा


कोहबर की दीवारों जैसे
मेरे अन्तर के आँगन में,
धुँधले से, पर अभी तलक हैं,
छापे माँ तेरे हाथों के।

कच्चे रंग की पक्की स्मृतियाँ
सब कुछ याद कहाँ रह पाता
स्वाद, खुशबुएँ, गीतों के स्वर
कतरे कुछ प्यारी बातों के।

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'आठ वर्ष'
जया प्रसाद


रिमझिम सावन बरसा जब
अंक तुम्हें भर लायी थी
कुछ खोयी सी, कुछ अबूझ
कुछ खुश, कुछ घबराई थी

गोल मटोल, चार पैर पर
घर आँगन सब नाप लिया
नन्हे वामन जैसे तुमने
मेरा परिसीमन भांप लिया

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :

'मोतीयों पर टहलते हुए'
पूनम दीक्षित


एक काव्य यात्रा है| एक अहसास से दूसरे अहसास तक धीरे धीरे टहलते हुए कोई आपा धापी नहीं, बवंडर नहीं। यह टहलना एक निश्चित संवृद्धि और मंजिल की ओर गतिशील है। संवृद्धि भावों की, संवृद्धि अनुभूति की। कुछ भी बलात लिखने के लिए लिखा सा नहीं है। कवि का उदगार ईमानदारी से प्रस्तुत है कि “सत्य और स्वप्न के बीच कोई ज्यामितीय रेखा नहीं है। इनके बीच की सरहद बादल की तरह चलायमान है।” ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
आपकी कविता | सम्पर्क करें | हमारा परिचय

a  MANASKRITI  website