अप्रतिम कविताएँ
ओ माँ बयार
सूरज को, कच्ची नींद से
जगाओ मत।
दूध-मुँहे बालक-सा
दिन भर झुंझलायेगा
मचलेगा, अलसायेगा
रो कर, चिल्ला कर,
घर सिर पर उठायेगा।
आदत बुरी है यह
किन्तु बालक तुम्हारा है,
ओ माँ बयार!
थपकियाँ दे-देकर सुला दो
इसे बादल उढ़ा दो
इस तरह रुलाओ मत।
सूरज को कच्ची नींद से
जगाओ मत।
- शान्ति मेहरोत्रा
संकलन रूपाम्बरा से
विषय:
प्रकृति (41)
सूरज धूप (8)
बाल कविता (10)
सर्दी (5)

काव्यालय को प्राप्त: 15 Apr 2024. काव्यालय पर प्रकाशित: 6 Dec 2024

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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