बड़े निराले होते हैं,
जीवन के ये रंग।
कभी उषा की लालिमा
बन कर मन में
आशाओं के कमल
खिला जाते हैं
तो कभी
निराशा की स्याही में
सब डुबा डालते हैं।
किस रंग की
चर्चा करूँ मैं ?
वह जो तरुणाई में
प्रेम की रक्तिम आभा बनकर
लुभाता रहा
अथवा वह
जो सुखी परिवार
की हरियाली में मन को
परितृप्त करता रहा?
रंग-बिरंगी उस बगिया में
कब पतझड़ आया,
पता ही नहीं चला।
सारे रंग विलीन हो गये
शून्य में
और तभी प्रकट हुआ
एक शुभ्र आलोक,
कानों में गूंजा
अनहद नाद, ओंकार का,
सत्य के पवित्र श्वेत रंग में
समा गए
जीवन के सभी रंग
और मन डूब गया
ब्रह्मानंद के सागर में!!
तुम्हारे पास बहुत से रंग हैं
दोस्ती, प्यार, इकरार,
उम्मीदों और खुशियों के।
सपनों का तो रंग-बिरंगा
चंदोवा ही तान दिया है तुमने।
निश्छल मुस्कान का ...
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