अप्रतिम कविताएँ
वो हवा वहीं ठहरी है
वो हवा वहीं ठहरी है अभी तक
और छूती है रोज
लगभग रोक लेती हुई सी
जब गुजरने लगता हूँ वहाँ से
जहाँ उस दिन गुजरते फोन आ गया था तुम्हारा
और थोड़ी देर के लिए आस पास
चम्पा के फूल खिल आये थे
अपनी साँसों में समेटते हुए
कई सा हरा रंग ओढ़ लिया था धरती ने
और कोंपलें निकल आई थीं डालियों में

जो प्राण को सुहाना कर देता है
लिपे हुए आँगन सा
और नये पुआल से सजे घर सा
जो जुगनुओं से पाट देता है आकाश को
और दूबों से भोर
बौना करके कलह सारा
खुशबू के इस ठहराव और
रंगों के ऐसे रुक जाने के लिए
हवा के ऐसे ठिठक जाने और
रचना की खिलखिलाहट के लिए
तुम्हें, मुझे
और दुनिया के तमाम लोगों को
प्यार करते रहना चाहिये

- प्रकाश देवकुलिश
विषय:
प्रेम (63)
बीता समय (18)

काव्यालय को प्राप्त: 22 Jul 2021. काव्यालय पर प्रकाशित: 10 Sep 2021

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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