अप्रतिम कविताएँ
दरख़्त-सी कविता
दरख़्त-सी कविता
तनी रहती है, खड़ी रहती है
झंझावातों को हँसकर भगा देती है
बिजली, वर्षा, ओलों की चोटों के बाद भी
देती रहती है हरियाली
विचारों के अकाल में

आसान नहीं होता दरख़्त-सी कविता को
ढहा देना

'यदा यदा हि धर्मस्य' की ग्लानि के लिए
शताब्दी में आता है कोई कलयुगपुरुष
'जानामि अधर्मं, न च मे निवृत्ति' की तरह
जब पैदा होता है कोई दुर्योधन, कोई कंस
तब बड़ी साजिशों के साथ
आरा, कुल्हाड़ा चलाकर
काटे जाते हैं ऐसी कविता के हाथ पाँव
भूलकर कि फिर कोपलें फूट आती हैं
जैसे प्रेम अँखुआता ही है
भेद के जहरीले संसार में भी
जैसे हर दंगे में घुली होती है
बचाने वाले की भी कहानी

बस तपस्वी-सा
देना पड़ता है दरख़्त बनने-सा समय कविता को
और छाया मिलती रहती है पीढ़ी दर पीढ़ी।

- प्रकाश देवकुलिश
दरख्त = पेड़
जानामि अधर्मं न च मे निवृत्ति = मैं जानता हूँ अधर्म क्या है, लेकिन उसे छोड़ ही नहीं सकता हूँ

काव्यालय को प्राप्त: 22 Jul 2021. काव्यालय पर प्रकाशित: 6 Aug 2021

***
सहयोग दें
विज्ञापनों के विकर्षण से मुक्त, काव्य के सौन्दर्य और सुकून का शान्तिदायक घर... काव्यालय ऐसा बना रहे, इसके लिए सहयोग दे।

₹ 500
₹ 250
अन्य राशि
प्रकाश देवकुलिश
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ

 जीवन की करो गिनती
 दरख़्त-सी कविता
 प्रणाम
 वो हवा वहीं ठहरी है
इस महीने :
'कहीं कुछ भी उथला न रह जाए'
ज्योति चावला


इन दिनों मैं डूब-उतरा रही हूँ
अपने ही भीतर के पानी में
ऐसे जैसे एक प्याला हो मेरी देह और
चाय पत्ती के सैशे-सा मेरा व्यक्तित्व
डूब और उतरा रहा है अपने ही भीतर कहीं

न जाने क्यूँ जितनी बार उबरती हूँ खुद से
फिर-फिर डूब जाना चाहती हूँ खुद में ही
कि सदियाँ गवाह हैं ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'तोड़ती पत्थर'
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'


वह तोड़ती पत्थर;
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर—
वह तोड़ती पत्थर।

कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;
श्याम तन, भर बँधा यौवन,
नत नयन प्रिय, कर्म-रत मन,
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
सम्पर्क करें | हमारा परिचय
सहयोग दें

a  MANASKRITI  website