अप्रतिम कविताएँ
पिया बिन नागिन काली रात
पिया बिन नागिन काली रात ।
कबहुँ यामिन होत जुन्हैया, डस उलटी ह्वै जात ॥
यंत्र न फुरत मंत्र नहिं लागत, आयु सिरानी जात ।
'सूर' श्याम बिन बिकल बिरहिनी, मुर-मुर लहरें खात ॥
- सूरदास
Ref: Swantah Sukhaaya
Pub: National Publishing House, 23 Dariyagunj, New Delhi - 110002
विषय:
विरह (13)
कृष्ण (18)

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 निसिदिन बरसत नैन हमारे
 पिया बिन नागिन काली रात
 प्रीति करि काहु सुख न लह्यो
 मेरो मन अनत कहाँ सुख पावे
 मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो
 सखी, इन नैनन तें घन हारे
इस महीने :
'ठहराव'
राहुल सिंह 'राहु'


आओ हम न सोचें कुछ,
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कौन सा यह भ्रम है?
..

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इस महीने :
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वाणी मुरारका


आज जब चुनाव नहीं हैं,
आज फिर से चुनती हूँ --
इस देश को मैं अपने मन में
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..

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इस महीने :
'तू ज़िंदा है'
शैलेंद्र


तू ज़िंदा है तो ज़िंदगी की जीत पे यक़ीन कर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर।

ये सुबह-ओ-शाम के रँगे हुए गगन को चूमकर
तू सुन ज़मीन गा रही है कब से झूम-झूम कर!

तू आ मेरा सिंगार कर तू आ मुझे हसीन कर।
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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