अप्रतिम कविताएँ
काहे री नलिनी तूं कुमिलानी
काहे री नलिनी तूं कुमिलानी ।
तेरे ही नालि सरोवर पानीं ॥
जल में उतपति जल में बास, जल में नलिनी तोर निवास ।
ना तलि तपति न ऊपरि आगि, तोर हेतु कहु कासनि लागि ॥
कहे 'कबीर' जे उदकि समान, ते नहिं मुए हमारे जान ।
- कबीरदास
विषय:
जीवन (37)
प्रकृति (41)
अध्यात्म दर्शन (36)

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