छूटती हुई सांसे,
बुझते हुए मन,
आज जिन्दगी
एक नए अन्दाज़ में है ।
दूरियां बढ़ाते बढ़ाते,
कुछ लोग बहुत दूर
निकल गए हैं,
लौटना मुश्किल है ।
मोहब्बतें अब बिल्कुल भी,
जिस्मानी नही हैं,
रूहें रूहों से मिलने को
तैयार हैं ।
जंगलों की तरह
फैलती इंसानियत,
अब धीरे धीरे
सिमटने लगी है ।
मालूम तो था कि
अकेले ही जाना है,
पर
इतना अकेले?
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।