तैर रहा इतिहास नदी में
तैर रहा है
यहाँ, बंधु, इतिहास नदी में

खँडहर कोट-कँगूरे तिरते उधर मगध के
इधर लहर लेकर आई है अक़्स अवध के

काँप रही है
उनकी बूढ़ी साँस नदी में

डोल रहा है महाबोधि बिरवे का साया
वहीँ तिर रही कल्पवृक्ष की भी है छाया

घोल रहे वे
सदियों की बू-बास नदी में

कहीं अहल्या कहीं द्रोपदी की परछाईं
सिया-राम की झलक अभी दी उधर दिखाई

लहर रहा है
पुरखों का विश्वास नदी में
- कुमार रवीन्द्र
बिरवा : पेड़

काव्यालय को प्राप्त: 7 Dec 2018. काव्यालय पर प्रकाशित: 4 Jan 2019

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विचारों से।
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..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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मेरे गीत यह
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जलाये तो हैं
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नयन से गिराये तो हैं
नेह की डालियों से
सुगन्धित सुमन
सांवरे श्री चरण पर
चढ़ाये तो हैं
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
आपकी आवाज़ से दुनिया बदल सकती तो है
दिल में जो नग़मा सुलगता है, सुना कर देखिये।

रोशनी आने को एक दिन खुद-ब-खुद आ जायेगी
आज तो तारीक़ियों को ही जला कर देखिये।

~ विनोद तिवारी| ग़ज़ल "बेकली महसूस हो तो" के कुछ शेर, संकलन "समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न" से

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