अप्रतिम कविताएँ
चाय 5

कभी किसी
और कभी
किसी और के नाम पर
दूर होते गए हैं हम
छोटी-छोटी खुशियों से,
इस चाय की तरह
जिसमें रह गई हैं
चाय के नाम पर
अब बस चंद पत्तियाँ,
चलो न,
वापस लौटें उसी भरपूर वक़्त में
और भर लें एक बार फिर
इस पानी-पानी जीवन में
अदरक जैसी तेज़ी
इलायची जैसी खुशबू
चीनी जैसी मिठास
और दूध जैसा प्यार !
- नूपुर अशोक

काव्यालय को प्राप्त: 5 Aug 2022. काव्यालय पर प्रकाशित: 8 Aug 2023

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क्लेर हार्नर


कब्र पे मेरी बहा ना आँसू
हूँ वहाँ नहीं मैं, सोई ना हूँ।

झोंके हजारों हवाओं की मैं
चमक हीरों-सी हिमकणों की मैं
शरद की गिरती फुहारों में हूँ
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..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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..

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कहा - यह मेरी माँ का हाथ पकड़कर बड़ा हुआ है
इसके पास आज भी उसका स्पर्श है
जंगल का हाथ पकड़कर
मेरे...
..

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