शून्य कर दो
मुझको फिर से शून्य कर दो
तुम्हारे योग से ही तो पूर्ण हुआ था
फिर भूल गया
मेरा अस्तित्व था नगण्य
तुमसे जुड़े बिन
नए अंकों से मिल कर
मैंने मान लिया था स्वयं को
पूर्ण से भी कुछ अधिक
आज जब अंतरमन से भाग न सका
तो बोध हुआ ये
के तुमने ही तो इस निष्प्राण को
जीवन दिया था
आत्म-ग्लानि से होके विचलित
कर रहा हूँ तुमसे विनती
मुझको फिर से शून्य कर दो
हो सकूँ यदि मैं परिष्कृत
फिर भले तुम पूर्ण कर दो
पर आज मुझको शून्य कर दो
- विनीत मिश्रा

काव्यालय को प्राप्त: 23 Apr 2014. काव्यालय पर प्रकाशित: 7 Jun 2018

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इस महीने
'चिकने लम्बे केश'
भवानीप्रसाद मिश्र


चिकने लम्बे केश
काली चमकीली आँखें
खिलते हुए फूल के जैसा रंग शरीर का
फूलों ही जैसी सुगन्ध शरीर की
समयों के अन्तराल चीरती हूई
अधीरता इच्छा की
..

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इस महीने
'जबड़े जीभ और दाँत'
भवानीप्रसाद मिश्र


जबड़े जीभ और दाँत दिल छाती और आँत
और हाथ पाँव और अँगुलियाँ और नाक
और आँख और आँख की पुतलियाँ
तुम्हारा सब-कुछ जाँचकर देख लिया गया है
और तुम जँच नहीं रहे हो
लोगों को लगता है
जीवन जितना
नचाना चाहता है तुम्हें
तुम उतने नच नहीं रहे हो

..

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इस महीने
'कुछ नहीं हिला उस दिन'
भवानीप्रसाद मिश्र


कुछ नहीं हिला उस दिन
न पल न प्रहर न दिन न रात

सब निक्ष्चल खड़े रहे
ताकते हूए अस्पताल के परदे
और दरवाजे और खिड़कीयाँ
और आती-जाती लड़कियाँ
जिन्हे मैं सिस्टर नहीं कहना चाहता था
..

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शुक्रवार 24 मई को

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