अप्रतिम कविताएँ

कविता की कविता
जीवन की आपाधापी में खुद से मिल पाना
ऐसा ही तो होता है ना! कविता लिख पाना

वर्ष पर्यन्त गुलमोहर प्रतीक्षारत रहता है
कुछ दिन धमनियों में नारंगी रंग बहता है
पुष्पों का खिलना और वृक्ष का
खिल खिल खिल जाना
ऐसा ही तो होता है ना! कविता लिख पाना

प्रेम के नर्तन में राधा पहले पायल हो जाती है
विरह वेदना गीतों से फिर घायल हो जाती है
कृष्ण का एक आलिंगन और घावों का
सिल सिल सिल जाना
ऐसा ही तो होता है ना! कविता लिख पाना

एक समय उपरान्त प्रसव पीड़ा बन्द होती है
कभी मुक्तक जन्मता है कभी छन्द होती है
और मन की वीणा के तारों का
हिल हिल हिल जाना
ऐसा ही तो होता है ना! कविता लिख पाना
- विनीत मिश्रा
काव्यपाठ: हेमंत देवलेकर
प्रसव -- बच्चे को जन्म देना
विषय:
सृजन (11)

काव्यालय को प्राप्त: 24 May 2024. काव्यालय पर प्रकाशित: 9 Aug 2024

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 कविता की कविता
 शून्य कर दो
इस महीने :
'सृष्टि का सार'
अंशु जौहरी


रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार

स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'लेखक'
आशीष क़ुरैशी ‘माहिद’


ख़ाली पन्ना किसी खेत-सा
पड़ा रहता है उजाड़।
क़लम की नोक ही बनती है
कुदाल, हँसिया और हल।

हल, जो यादों को कुरेदते हुए
अतीत को खरोंचते हुए

..

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'गुनाह का गीत'
धर्मवीर भारती


अगर मैंने किसी के होंठ के पाटल कभी चूमे
अगर मैंने किसी के नैन के बादल कभी चूमे
महज इससे किसी का प्यार मुझको पाप कैसे हो?
महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?

तुम्हारा मन अगर सींचूँ
गुलाबी तन अगर सीचूँ तरल मलयज झकोरों से!
तुम्हारा चित्र खींचूँ प्यास के रंगीन डोरों से
कली-सा तन, किरन-सा ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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