अप्रतिम कविताएँ
रिश्ते
रिश्तों को सीमाओं में नहीं बाँधा करते
उन्हें झूँठी परिभाषाओं में नहीं ढाला करते

उडनें दो इन्हें उन्मुक्त पँछियों की तरह
बहती हुई नदी की तरह
तलाश करनें दो इन्हें अपनी सीमाएं
खुद ही ढूँढ लेंगे उपमाएं

होनें दो वही जो क्षण कहे
सीमा वही हो जो मन कहे
- अनूप भार्गव
Anoop Bhargava
email: [email protected]
विषय:
रिश्ते (18)

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अंक तुम्हें भर लायी थी
कुछ खोयी-सी, कुछ अबूझ
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गोल-मटोल, चार पैर पर
घर-आँगन सब नाप लिया
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..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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रूठना- मचलना- न नहाने की ज़िद करते रहना
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..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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