अप्रतिम कविताएँ
प्रिय चिरन्तन है सजनि
       प्रिय चिरन्तन है सजनि,
              क्षण क्षण नवीन सुहागिनी मैं!

श्वास में मुझको छिपा कर वह असीम विशाल चिर घन,
शून्य में जब छा गया उसकी सजीली साध-सा बन,
       छिप कहाँ उसमें सकी
              बुझ-बुझ जली चल दामिनी मैं!

छाँह को उसकी सजनि नव आवरण अपना बना कर,
धूलि में निज अश्रु बोने मैं पहर सूने बिता कर,
       प्रात में हँस छिप गई
              ले छलकते दृग यामिनी मैं!

मिलन-मन्दिर में उठा दूँ जो सुमुख से सजल गुण्ठन,
मैं मिटूँ प्रिय में मिटा ज्यों तप्त सिकता में सलिल-कण,
       सजनि मधुर निजत्व दे
              कैसे मिलूँ अभिमानिनी मैं!

दीप-सी युग-युग जलूँ पर वह सुभग इतना बता दे,
फूँक से उसकी बुझूँ तब क्षार ही मेरा पता दे!
       वह रहे आराध्य चिन्मय
              मृण्मयी अनुरागिनी मैं!

सजल सीमित पुतलियाँ पर चित्र अमिट असीम का वह,
चाह वह अनन्त बसती प्राण किन्तु ससीम सा यह,
       रज-कणों में खेलती किस
              विरज विधु की चाँदनी मैं?
- महादेवी वर्मा
विषय:
प्रेम (63)
भक्ति और प्रार्थना (31)
अध्यात्म दर्शन (38)

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..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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