जो तुम आ जाते एक बार
जो तुम आ जाते एक बार
कितनी करुणा कितने सँदेश,
पथ में बिछ जाते बन पराग,
गाता प्राणों का तार-तार
अनुराग-भरा उन्माद-राग;
आँसू लेते वे पद पखार !
जो तुम आ जाते एक बार !

हँस उठते पल में आर्द्र नयन
घुल जाता ओठों से विषाद,
छा जाता जीवन में वसंत
लुट जाता चिर-संचित विराग;
आँखें देतीं सर्वस्व वार |
जो तुम आ जाते एक बार !
- महादेवी वर्मा
काव्यपाठ: गीतिका जैसवाल

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महादेवी वर्मा
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 कौन तुम मेरे हृदय में
 जो तुम आ जाते एक बार
 तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या
 पंथ होने दो अपरिचित
 प्रिय चिरन्तन है सजनि
 मेरे दीपक
इस महीने :
'रचना और तुम'
रमानाथ अवस्थी


मेरी रचना के अर्थ बहुत हैं
जो भी तुमसे लग जाय लगा लेना

मैं गीत लुटाता हूँ उन लोगों पर
दुनियाँ में जिनका कुछ आधार नहीं
मैं आँख मिलाता हूँ उन आँखों से
जिनका कोई भी पहरेदार नहीं

आँखों की भाषा तो अनगिन हैं
जो भी सुन्दर हो वह समझा देना।

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इस महीने :
'कर्म'
किरीटचन्द्र जोशी


कर्म दैविक सम्पदा का द्वार है;
विश्व के उत्कर्ष का आधार है।

कर्म जीवन का मधुरतम काव्य है;
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शुक्रवार 31 जनवरी को

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