नृत्य
धूसर रेत के
टीले पर
चाँदनी
आई उतर

साठ कली का
घाघरा
अँगिया
एक कली भर

पीले, लाल
सुर्ख रंगों से
रंगी थी
उसकी चूनर

वाणी सुरीली
कमर लचीली
पाँव उठे जो इस गोरी के
कैसे झूमी रेत नचीली।
- दिव्या माथुर
Divya Mathur
email: divyamathur at aol dot com
Divya Mathur
email: [email protected]

***
दिव्या माथुर
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ

 एक बौनी बूँद
 धत्
 नृत्य
इस महीने
'क्षुद्र की महिमा'
श्यामनंदन किशोर


शुद्ध सोना क्यों बनाया, प्रभु, मुझे तुमने,
कुछ मिलावट चाहिए गलहार होने के लिए।

जो मिला तुममें भला क्या
भिन्नता का स्वाद जाने,
जो नियम में बंध गया
वह क्या भला अपवाद जाने!

जो रहा समकक्ष, करुणा की मिली कब छांह उसको
कुछ गिरावट चाहिए, उद्धार होने के लिए।
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
अगली प्रस्तुति
शुक्रवार 22 फरवरी को

सूचना पाने के लिए
ईमेल दर्ज़ करें
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
आपकी कविता | सम्पर्क करें | हमारा परिचय

a  MANASKRITI  website