अप्रतिम कविताएँ पाने
नया वर्ष
नए वर्ष में नई पहल हो
कठिन ज़िंदगी और सरल हो
अनसुलझी जो रही पहेली
अब शायद उसका भी हल हो
जो चलता है वक़्त देखकर
आगे जाकर वही सफल हो
नए वर्ष का उगता सूरज,
सबके लिए सुनहरा पल हो
समय हमारा सदा साथ दे
कुछ ऐसी आगे हलचल हो
सुख के चौक पुरैं हर द्वारे
सुखमय आंगन का हर पल हो।
- अज्ञात

काव्यालय को प्राप्त: 1 Jun 2015. काव्यालय पर प्रकाशित: 7 Jan 2022

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 नया वर्ष
 मंगलम्
सुबह के होने की अपनी अनुभूति और अनुपम कल्पना को एक कवि खूबसूरत शब्दों में ढालता है। उसे ऐसे मधुर सुर और नयनाभिराम मौलिक चित्रांकन मिलते हैं कि कविता सजीव हो आपके अंतर्मन में सुकून बन कर उतर जाती है -- इसे ही साकार किया है काव्यालय ने अपनी इस विशिष्ट प्रस्तुति में

इस महीने :
'ज़िंदगी की नोटबुक'
भावना सक्सैना


बहुत चाहा फेयर रखूँ
ज़िन्दगी की नोटबुक को
लेकिन हमेशा रफ ही पाया...

कॉपी के उन आखिरी दो पन्नों की तरह
जिन पर होते हैं हिसाब अनगिन
हिसाब बिठाने की कोशिश में
लेकिन, छूटा कोई हासिल
गुणा करते हुए, भाग ही पाया
बहुत चाहा...
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
इस महीने :
'अक्कड़ मक्कड़'
भवानीप्रसाद मिश्र


अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़,
दोनों मूरख, दोनों अक्खड़,
हाट से लौटे, ठाठ से लौटे,
एक साथ एक बाट से लौटे।

बात-बात में बात ठन गयी,
बांह उठीं और मूछें तन गयीं।
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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