अप्रतिम कविताएँ
लड़कियाँ
कहाँ चली जाती हैं
हँसती खिलखिलाती
चहकती महकती
कभी चंचल नदिया
तो कभी ठहरे तालाब सी लड़कियाँ

क्यों चुप हो जाती हैं
गज़ल सी कहती
नग़मों में बहती
सीधे दिल में उतरती
आदाब सी लड़कियाँ

क्यों उदास हो जाती हैं
सपनों को बुनती
खुशियों को चुनती
आज में अपने कल को ढूंढती
बेताब सी लड़कियाँ

कल दिखी थी, आज नहीं दिखती
पंख तो खोले थे, परवाज़ नहीं दिखती
कहाँ भेज दी जाती हैं
उड़ने को आतुर
सुरख़ाब सी लड़कियाँ
- सुदर्शन शर्मा
Sudarshan Sharma
Email: [email protected]
Sudarshan Sharma
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विषय:
स्त्री (19)
समाज (33)

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रिमझिम सावन बरसा जब
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कुछ खोयी-सी, कुछ अबूझ
कुछ खुश, कुछ घबराई थी

गोल-मटोल, चार पैर पर
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..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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