अप्रतिम कविताएँ
यूंँ पति की मांँ बनते जाना
हर पल वीडियो दिखाकर फुसलाते जाना
और यूंँ कौरों का हलक से उतरते जाना ‌

कभी वायलिन पकड़ना, कभी झटक के रख देना
रूठना- मचलना- न नहाने की ज़िद करते रहना

कातर नजरों से मेरे हुक्म को सिर्फ तकते रहना
पुराने घर को तरसना, यूंँ खोजते-भटकते रहना

मजबूत हाथों का मेरी मुट्ठी में फिसलते जाना
बच्चे सी निश्छलता का आंँखों में उतरते जाना

गिले-शिकवों का ममता में यूंँ पिघलते जाना
हर पल मेरा शिशु-पति की मांँ बनते जाना

खिलाना-पिलाना-थपकाना-सहलाते जाना
बूढ़ी उम्र में नयी मांँ का यूंँ जंँवा होते जाना।
- किरण सिपानी
विषय:
विवाह (9)
बुढ़ापा बीमारी (10)
माँ ममता (6)

काव्यालय को प्राप्त: 17 May 2026. काव्यालय पर प्रकाशित: 9 Oct 2026

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इस महीने :
'यह करूँगा मैं'
सुहैर हम्माद


नहीं नाचूँगा मैं
तुम्हारे युद्ध के
नगाड़ों पर। न ही दूँगा
अपनी आत्मा, न ही अपनी अस्थियाँ
तुम्हारे युद्ध के नगाड़ों को। नहीं
नाचूँगा तुम्हारी
ताल पर। मैं जानता हूँ उस ताल को।
जान नहीं है उसमें। जिस चमड़े को ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'मौन के शब्द'
ऋतु शर्मा नन्नन पाँडे


छोटे-छोटे जूते लाइन में रखे थे,
मासूम आँखों में डर चिपका था,
नाम, धर्म, उम्र — सब मिटा दिए गए,
सिर्फ़ एक चिन्ह — स्टार ऑफ़ डेविड बाकी था।

बिना शोर के ट्रेनें चली थीं,
सपनों को डिब्बों में बंद कर,
हर स्टेशन पर कोई माँ रोई थी,
और बच्चों ने

ईंटों की दीवा ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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