अप्रतिम कविताएँ
कामायनी ('निर्वेद' परिच्छेद के कुछ छंद)
"तुमुल कोलाहल कलह में
मैं हृदय की बात रे मन!

        विकल होकर नित्य चंचल,
        खोजती जब नींद के पल,
        चेतना थक-सी रही तब,
        मैं मलय की वात रे मन!

चिर-विषाद-विलीन मन की,
इस व्यथा के तिमिर-वन की;
मैं उषा-सी ज्योति-रेखा,
कुसुम-विकसित प्रात रे मन!

        जहाँ मरु-ज्वाला धधकती,
        चातकी कन को तरसती,
        उन्हीं जीवन-घाटियों की,
        मैं सरस बरसात रे मन!

पवन की प्राचीर में रुक
जला जीवन जी रहा झुक,
इस झुलसते विश्व-दिन की
मैं कुसुम-ऋतु-रात रे मन!

        चिर निराशा नीरधर से,
        प्रतिच्छायित अश्रु-सर में,
        मधुप-मुखर-मरंद-मुकुलित,
        मैं सजल जलजात रे मन!"
- जयशंकर प्रसाद

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 प्रयाणगीत
 बीती विभावरी जाग री!
इस महीने :
'कहीं कुछ भी उथला न रह जाए'
ज्योति चावला


इन दिनों मैं डूब-उतरा रही हूँ
अपने ही भीतर के पानी में
ऐसे जैसे एक प्याला हो मेरी देह और
चाय पत्ती के सैशे-सा मेरा व्यक्तित्व
डूब और उतरा रहा है अपने ही भीतर कहीं

न जाने क्यूँ जितनी बार उबरती हूँ खुद से
फिर-फिर डूब जाना चाहती हूँ खुद में ही
कि सदियाँ गवाह हैं ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'तोड़ती पत्थर'
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'


वह तोड़ती पत्थर;
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर—
वह तोड़ती पत्थर।

कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;
श्याम तन, भर बँधा यौवन,
नत नयन प्रिय, कर्म-रत मन,
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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