बीती विभावरी जाग री!
बीती विभावरी जाग री!
                  अम्बर पनघट में डुबो रही
                  तारा घट ऊषा नागरी।
खग कुल-कुल सा बोल रहा,
किसलय का अंचल डोल रहा,
                  लो यह लतिका भी भर लाई
                  मधु मुकुल नवल रस गागरी।
अधरों में राग अमंद पिये,
अलकों में मलयज बंद किये
                  तू अब तक सोई है आली
                  आँखों में भरे विहाग री।
- जयशंकर प्रसाद
काव्यपाठ: विनोद तिवारी

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जयशंकर प्रसाद
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इस महीने : समर्पण गीत
'आत्म-समर्पण'
रामकुमार वर्मा


सजल जीवन की सिहरती धार पर,
लहर बनकर यदि बहो, तो ले चलूँ।

यह न मुझसे पूछना, मैं किस दिशा से आ रहा हूँ,
है कहाँ वह चरणरेखा, जो कि धोने जा रहा हूँ,
पत्थरों की चोट जब उर पर लगे,
एक ही "कलकल" कहो, तो ले चलूँ।

सजल जीवन की सिहरती धार पर,
लहर बनकर यदि बहो, तो ले चलूँ।

मार्ग में तुमको मिलेंगे वात के प्रतिकूल झोंके,
दृढ़ शिला के खण्ड होंगे दानवों से राह रोके,
यदि प्रपातों के भयानक तुमुल में,
भूल कर भी भय न हो, तो ले चलूँ।

सजल जीवन की सिहरती धार पर,
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शुक्रवार 3 अप्रैल को

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