स्वीकार करो
अर्पित मेरी भावना-- इसे स्वीकार करो ।

तुमने गति का संघर्ष दिया मेरे मन को,
सपनों को छवि के इन्द्रजाल का सम्मोहन;
तुमने आँसू की सृष्टि रची है आँखों में
अधरों को दी है शुभ्र मधुरिमा की पुलकन।

उल्लास और उच्छ्वास तुम्हारे ही अवयव
तुमने मरीचिका और तृषा का सृजन किया,
अभिशाप बनाकर तुमने मेरी सत्ता को
मुझको पग-पग पर मिटने का वरदान दिया,

मैं हँसा, तुम्हारे हँसते-से संकेतों पर
मैं फूट पड़ा, लख बंक भृकुटि का संचालन
अपनी लीलाओं से हे विस्मित और चकित,
अर्पित मेरी भावना-- इसे स्वीकार करो।

अर्पित है मेरा कर्म-- इसे स्वीकार करो |

क्या पाप और क्या पुण्य इसे तो तुम जानो,
करना पड़ता है केवल इतना ज्ञात यहाँ;
आकाश तुम्हारा और तुम्हारी ही पृथ्वी,
तुममें ही तो इन साँसों का आघात यहाँ;

तुममे निर्बलता और शक्ति इन हाथों की
मैं चला कि चरणों का गुण केवल चलना है
ये दृश्य रचे, दी वहीं दृष्टि तुमने मुझको
मैं क्या जानूँ क्‍या सत्य और क्‍या छलना है।

रच-रचकर करना नष्ट तुम्हारा ही गुण है,
तुममें ही तो है कुंठा इन सीमाओं की,
है निज असफलता और सफलता से प्रेरित
अर्पित है मेरा कर्म-- इसे स्वीकार करो।

अर्पित मेरा अस्तित्व-- इसे स्वीकार करो।

रंगों की सुषमा रच, मघु ऋतु जल जाती है,
सौरभ बिखराकर फूल धूल बन जाता है,
धरती की प्यास बुझा जाता गलकर बादल,
पाषाणों से टकराकर निर्झर गाता है,

तुमने ही तो पागलपन का संगीत दिया,
करुणा बन गलना तुमने मुझको सिखलाया
तुमने ही मुझको यहाँ धूल से ममता दी
रंगों में जलना मैंने तुमसे ही पाया।

उस ज्ञान और भ्रम में ही तो तुम चेतन हो
जिनसे मैं बरबस उठता-गिरता रहता हूँ
निज खंड-खंड में हे असीम तुम हे अखंड !
अर्पित मेरा अस्तित्व-- इसे स्वीकार करो।
- भगवती चरण वर्मा

काव्यालय पर प्रकाशित: 23 Oct 2020

***
इस महीने :
'आशा कम विश्वास बहुत है'
बलबीर सिंग 'रंग'


जाने क्यों तुमसे मिलने की
आशा कम, विश्वास बहुत है।

सहसा भूली याद तुम्हारी
उर में आग लगा जाती है
विरह-ताप भी मधुर मिलन के
सोये मेघ जगा जाती है,
मुझको आग और पानी में
रहने का अभ्यास बहुत है
जाने क्यों तुमसे मिलने की
आशा कम, विश्वास बहुत है।
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मैं अँधेरों से निकल कर,
ढूँढ लाऊँगा उजाले।
मृत्यु पर भी हो विजयिनी,
ज्योति यह अमरत्व पा ले।
तुम खड़ी हो राह में,
विश्वास के दीपक जलाये।
ये भटकते गीत मेरे,
लो तुम्हारे पास आये।

~ विनोद तिवारी
(कविता "लो तुम्हारे पास आए" से)
दीपावली की शुभ कामनाएँ। मन में विश्वास के दीप जलते रहें।
इस महीने :

'एक ईमेल की कहानी'
वाणी मुरारका


एक समय की बात है, एक संवेदनशील, स्नेहिल पुरुष ने एक प्यारी, बुद्धु, डरी हुई लड़की को एक ईमेल भेजा।

वह लड़की किसी बात से विचलित थी, और ऐसी मन:स्थिति में उसने कह डाला, “अगर ऐसा हुआ, मेरे मन में अपने प्रति सम्मान नहीं बचेगा।“

वह लड़की विचलित होने में व्यस्त थी, तो उसके बीच में उस पुरुष ने कुछ नहीं कहा। अगले दिन उन्होंने एक ईमेल भेजा।
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
आपकी कविता | सम्पर्क करें | हमारा परिचय

a  MANASKRITI  website