अप्रतिम कविताएँ

फिर मन में ये कैसी हलचल ?
           वर्षों से जो मौन खड़े थे
           निर्विकार निर्मोह बड़े थे
उन पाषाणों से अब क्यूँकर अश्रुधार बह निकली अविरल
           फिर मन में ये कैसी हलचल ?

           निश्चल जिनको जग ने माना
           गुण-स्वभाव से स्थिर नित जाना
चक्रवात प्रचंड उठते हैं क्यूँ अंतर में प्रतिक्षण, प्रतिपल
           फिर मन में ये कैसी हलचल ?

           युग बीते जिनसे मुख मोड़ा
           जिन स्मृतियों को पीछे छोड़ा
अब क्यूँ बाट निहारें उनकी पलपल होकर लोचन विह्वल?
           फिर मन में ये कैसी हलचल ?
- अर्चना गुप्ता
Archana Gupta
Email : [email protected]
Archana Gupta
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विषय:
अन्तर्मन (14)

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 इक कविता
 फिर मन में ये कैसी हलचल ?
इस महीने :
'आठ वर्ष'
जया प्रसाद


रिमझिम सावन बरसा जब
अंक तुम्हें भर लायी थी
कुछ खोयी-सी, कुछ अबूझ
कुछ खुश, कुछ घबराई थी

गोल-मटोल, चार पैर पर
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नन्हे वामन जैसे तुमने
..

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किरण सिपानी


हर पल वीडियो दिखाकर फुसलाते जाना
और यूंँ कौरों का हलक से उतरते जाना ‌
कभी वायलिन पकड़ना, कभी झटक के रख देना
रूठना- मचलना- न नहाने की ज़िद करते रहना
कातर नजरों से मेरे हुक्म को सिर्फ तकते रहना
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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