अप्रतिम कविताएँ
कौन तुम
कौन तुम अरुणिम उषा-सी मन-गगन पर छा गयी हो!

              लोक धूमिल रँग दिया अनुराग से,
              मौन जीवन भर दिया मधु राग से,
              दे दिया संसार सोने का सहज
              जो मिला करता बड़े ही भाग से,
कौन तुम मधुमास-सी अमराइयाँ महका गयी हो!

             वीथियाँ सूने हृदय की घूम कर,
             नव-किरण-सी डाल बाहें झूम कर,
             स्वप्न-छलना से प्रवंचित प्राण की
             चेतना मेरी जगायी चूम कर,
कौन तुम नभ-अप्सरा-सी इस तरह बहका गयी हो!

             रिक्त उन्मन उर-सरोवर भर दिया
             भावना-संवेदना को स्वर दिया,
             कामनाओं के चमकते नव शिखर
             प्यार मेरा सत्य शिव सुन्दर किया,
कौन तुम अवदात री! इतनी अधिक जो भा गयी हो!
- डा. महेन्द्र भटनागर
विषय:
प्रेम (63)

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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