इतने ऊँचे उठो
इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है।
      देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से
      सिंचित करो धरा, समता की भाव वृष्टि से
           जाति भेद की, धर्म-वेश की
           काले गोरे रंग-द्वेष की
           ज्वालाओं से जलते जग में
इतने शीतल बहो कि जितना मलय पवन है॥

नये हाथ से, वर्तमान का रूप सँवारो
नयी तूलिका से चित्रों के रंग उभारो
           नये राग को नूतन स्वर दो
           भाषा को नूतन अक्षर दो
           युग की नयी मूर्ति-रचना में
इतने मौलिक बनो कि जितना स्वयं सृजन है॥

लो अतीत से उतना ही जितना पोषक है
जीर्ण-शीर्ण का मोह मृत्यु का ही द्योतक है
           तोड़ो बन्धन, रुके न चिन्तन
           गति, जीवन का सत्य चिरन्तन
           धारा के शाश्वत प्रवाह में
इतने गतिमय बनो कि जितना परिवर्तन है।

चाह रहे हम इस धरती को स्वर्ग बनाना
अगर कहीं हो स्वर्ग, उसे धरती पर लाना
           सूरज, चाँद, चाँदनी, तारे
           सब हैं प्रतिपल साथ हमारे
           दो कुरूप को रूप सलोना
इतने सुन्दर बनो कि जितना आकर्षण है॥
- द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
Pub: Indore University Press Pvt. Ltd.
30/7, Shakti Nagar, Delhi - 110007

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इस महीने :
'कैसा परिवर्तन'
आभा सक्सेना


प्रकृति मौन हो देख रही है
आज समय का परिवर्तन
मृत्यु खेलती है आंगन में
करती है भीषण नर्तन।

झंझावातों में मनुष्य का
साहस संबल टूट गया
भूल गया सब खेल अनोखे
भूल गया पूजा अर्चन।
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इस महीने :

'अभिभूत करतीं दिव्य-भव्य कवितायें : समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न'
अमृत खरे


विशिष्ट गीत कवि अमृत खरे की "समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न" पर पुस्तक समीक्षा

कविता संग्रह शूरु से अन्त तक पढ़ा, गुना, अनुभव किया और जिया| उसमें डूबा| मैं मैं न रहा| स्वयं कवि विनोद तिवारी हो गया| परकाया प्रवेश हो गया| यह निश्चित ही कवि और कविता की "सिद्धि" को सिद्ध करता है|

काव्य-संग्रह में अग्रज डॉ. तिवारी की कविता के अनेक रंग... ..

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इस महीने :

'समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न'
विनोद तिवारी


विनोद तिवारी की कविताओं का संकलन
काव्यालय का पुस्तक प्रकाशन
वाणी मुरारका की चित्रकला के संगे
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शुक्रवार 22 मई को

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