अप्रतिम कविताएँ
होली की शाम
होली की शाम सड़कें वीरान
जैसे गुज़र गया हो कारवाँ
छोड़ गया कुछ अपनी निशानियाँ --
बिखरे हुए रंग, फूटे गुब्बारे,
बिछे हुए पीपल के पत्ते,
डाल से टूटे चम्पा के फूल...
इक्का-दुक्का किशोरों की टोलियाँ,
लौटती घरों को,
रंगे हुए कपड़े और पुते हुए चेहरे
बयाँ कर रहे हैं ये दास्ताँ --
अभी अभी गुज़र गया यहाँ से
रँगों का एक कारवाँ
- गीता मल्होत्रा
Geeta Malhotra
Email: [email protected]

काव्यालय को प्राप्त: 18 Mar 2014. काव्यालय पर प्रकाशित: 22 Mar 2019

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स्वागत है अपनी...

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लेकिन इस कंकाल सी लड़की के भीतर एक कविता बची हुई थी-- मनुष्य के विवेक पर आस्था रखने वाली एक कविता। वह देख रही थी कि अमेरिकी सैनिक वहाँ पहुँच रहे हैं। इनमें सबसे आगे कर्ट क्लाइन था। उसने उससे पूछा कि वह जर्मन या अंग्रेजी कुछ बोल सकती है? गर्डा बताती है कि वह 'ज्यू' है। कर्ट क्लाइन बताता है कि वह भी 'ज्यू' है। लेकिन उसे सबसे ज़्यादा यह बात हैरानी में डालती है कि इसके बाद गर्डा जर्मन कवि गेटे (Goethe) की कविता 'डिवाइन' की एक पंक्ति बोलती है...

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