अप्रतिम कविताएँ
गुल्लू
'गुल्लू-मुल्लू', 'पारू बच्चा'
नाम एक से एक है अच्छा
'गौरी', 'गुल्लू', 'छोटा माँऊँ'
गिनते जाओ नाम सुनाऊँ
'गुल्ला रानी' बड़ी सयानी
दादी कहतीं सबकी नानी
बुआ को 'चन्दुल' जमता है
दादी को 'बहिनी' सहता है

भैया से जो होती मार
चंडी का लेतीं अवतार
'बिल्लू-भयंकर' जब खौराय
'गुल्लू-बजरंगी' गदा उठाय
विद्यालय में 'धृति' बुलाएँ
सीधी-सादी तब बन जाएँ
पापा दिन भर 'माँऊँ-माँऊँ'
कब तक इनके नाम गिनाऊँ

नाम तभी कम हो पाएंगे
पापा बड़े जब हो जाएंगे
बहुत गिन चुके इनके नाम
देखें करतीं क्या हैं काम

बिल्लू संग क्रिकेट खेलें जब
जीत रहे बस इनका मकसद
नियम गुल्लू के चलते हैं
बिल्लू बस 'हाँ-हाँ' करते हैं
बैटिंग पर जब हैं ये आतीं
पिच झटपट छोटी हो जाती
छोटा माँऊँ छोटी दौड़
तर्क पे इनके करिये गौर
आउट जो इनको कर जाती है
बॉल नहीं मानी जाती है

माँ का दुपट्टा लिए लपेट
टीचर का हैं धरती भेष
गुड़ियों की हैं क्लास लगातीं
ब्लैक-बोर्ड दीवार बनातीं
प्रश्न का उत्तर जब न पाएं
बहुत कड़क टीचर हो जाएँ
बच्चों की तब शामत आये
ऑल ऑफ़ यू को डाँट लगाएं

पापा से बिल्लू पढ़ता है
कभी कभी धम-धम पिटता है
तुरंत सजग ये हो जाती हैं
ढूंढ के झट डण्डा लाती हैं
धीरे से डंडा सरका
मौके पे जड़तीं चौका
बिल्लू भी मन में कहता
जरा बाद में तुम मिलना

चिड़िया भी माँऊँ की दोस्त
उसको देतीं पानी रोज
वह जब पानी पीने आये
जाने क्या दोनों बतलायें
चिड़िया करती चीं चीं चीं
शब्द नहीं, ये समझें जी
"बड़ी देर से आयी आज
लगी नहीं क्या तुमको प्यास
फुर्र - फुर्र उड़ जाती हो
जी भर न बतलाती हो
तनिक देर तो बैठो ना
चुग लो, मैं देती दाना
देखो यह गुल्लक रखा
करना तुम इसकी रक्षा
पास जरा भी बिल्लू देख
चीं चीं साईरन करना तेज़
हाथ लगाए गर इसको
चोंच हाथ पे धरना दो "

मम्मा से जो डाँट पड़ी
अँसुवन की लग गई झड़ी
ऊँहूँ-ऊँहूँ औ' सिसकी
धुन रहती हल्की-हल्की
पापा को बस आता देख
वॉल्यूम करतीं अपना तेज
पापा झटपट गोद उठायें
मम्मा को झुट्ठू हड़कायें
तिस पर भी अड़ जातीं ये
सॉरी खुद मम्मा बोलें

जिनको भी घर आना हो
सुन लें, गुल्लू-बिल्लू दो
चिज्जी एक नहीं लाना
महाभारत होगी वरना
और दीजियेगा आशीष
एक पिता को इतनी भीख

कविता जब यह आप पढ़ें
'वाह-वाह' मन अगर कहे
कहिये दोनों खूब बढ़ें
अपने सूरज चाँद गढ़ें ।

- प्रदीप शुक्ला
Email: [email protected]

काव्यालय को प्राप्त: 17 May 2021. काव्यालय पर प्रकाशित: 16 Jul 2021

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इन दिनों मैं डूब-उतरा रही हूँ
अपने ही भीतर के पानी में
ऐसे जैसे एक प्याला हो मेरी देह और
चाय पत्ती के सैशे-सा मेरा व्यक्तित्व
डूब और उतरा रहा है अपने ही भीतर कहीं

न जाने क्यूँ जितनी बार उबरती हूँ खुद से
फिर-फिर डूब जाना चाहती हूँ खुद में ही
कि सदियाँ गवाह हैं ..

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वह तोड़ती पत्थर;
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर—
वह तोड़ती पत्थर।

कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;
श्याम तन, भर बँधा यौवन,
नत नयन प्रिय, कर्म-रत मन,
..

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