अप्रतिम कविताएँ
यह कैसी दुर्धर्ष चेतना
यह कैसी दुर्धर्ष चेतना, प्रतिपल बढ़ती ही रहती है
चिंतन के उत्तुंग शिखर पर, गिर-गिर चढ़ती ही रहती है

पग-पग पर ठोकर लगने से, नए-नए अनुभव जगते हैं
बहते हुए घाव लोहू की, लौ जैसे जलते लगते हैं
और उसी के लाल उजाले में विचार चलता रहता है
धीरे-धीरे जैसे अपनी केन नदी में जल बहता है

मन के भीतर नए सूर्य की, प्रतिमा गढ़ती ही रहती है
यह कैसी दुर्धर्ष चेतना, प्रतिपल बढ़ती ही रहती है

यह विचार परिवर्तनधर्मी होकर दाय नया गहता है
जय के प्रति विश्वास लिए, युग की सर्दी-गर्मी सहता है
बीते हुए समय के तेवर फिर-फिर रोज़ उलझते रहते
पीड़ा की किरणों से इसके, सारे द्वंद्व सुलझते रहते

नभ पर लिखे हुए भावी के अक्षर पढ़ती ही रहती है
कैसी यह दुर्धर्ष चेतना, प्रतिपल बढ़ती ही रहती है
- कृष्ण मुरारी पहारिया
दुर्धर्ष : प्रबल, जिसे वश में करना कठिन है | केन नदी : मध्यप्रदेश में बहने वाली एक बड़ी नदी
विषय:
अध्यात्म दर्शन (38)

काव्यालय पर प्रकाशित: 31 May 2024

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पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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