अप्रतिम कविताएँ
धूप
घाटियों में ऋतु सुखाने लगी है
मेघ धोये वस्त्र अनगिन रंग के
आ गए दिन, धूप के सत्संग के।

पर्वतों पर छन्द फिर बिखरा दिये हैं
लौटकर जाती घटाओं ने।
पेड़, फिर पढ़ने लगे हैं, धूप के अख़बार
फ़ुरसत से दिशाओं में।
निकल, फूलों के नशीले बार से
लड़खड़ाती है हवा
पाँव दो, पड़ते नहीं हैं ढंग के।

बँध न पाई, निर्झरों की बाँह, उफनाई नदी
तटों से मुँह जोड़ बतियाने लगी है।
निकल जंगल की भुजाओं से, एक आदिम गंध
आँगन की तरफ आने लगी है।

आँख में आकाश की चुभने लगे हैं
दृश्य शीतल, नेह-देह प्रसंग के।
आ गए दिन, धूप के सत्संग के।
- विनोद निगम
Poet's Address: Sanichara, Hoshangabad, M.P
Ref: Naye Purane, April,1998
विषय:
प्रकृति (41)
सूरज धूप (8)

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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