अप्रतिम कविताएँ
धीरे-धीरे
एहसासों की लड़ी है
ये ज़िन्दगी।
धीरे-धीरे आगे बढ़ती हूँ ―
एक एक एहसास को
सहेज कर,
समेट कर,
रखती हूँ।
वक्त लगता है।

कमरा बिखरा रह जाता है।
- वाणी मुरारका
Vani Murarka
[email protected]
विषय:
धीरे-धीरे (4)

काव्यालय को प्राप्त: 22 Dec 2017. काव्यालय पर प्रकाशित: 9 Dec 2022

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कभी वायलिन पकड़ना, कभी झटक के रख देना
रूठना- मचलना- न नहाने की ज़िद करते रहना
कातर नजरों से मेरे हुक्म को सिर्फ तकते रहना
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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सुहैर हम्माद


नहीं नाचूँगा मैं
तुम्हारे युद्ध के
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तुम्हारे युद्ध के नगाड़ों को। नहीं
नाचूँगा तुम्हारी
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जान नहीं है उसमें। जिस चमड़े को ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'मौन के शब्द'
ऋतु शर्मा नन्नन पाँडे


छोटे-छोटे जूते लाइन में रखे थे,
मासूम आँखों में डर चिपका था,
नाम, धर्म, उम्र — सब मिटा दिए गए,
सिर्फ़ एक चिन्ह — स्टार ऑफ़ डेविड बाकी था।

बिना शोर के ट्रेनें चली थीं,
सपनों को डिब्बों में बंद कर,
हर स्टेशन पर कोई माँ रोई थी,
और बच्चों ने

ईंटों की दीवा ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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