अप्रतिम कविताएँ
बिखरे पत्ते
इस बसंत में सखी सुना है तुमने
नीम कोंपलें फूटी थी

बढ़ते बचपन के पंखों पर
कड़वे सच की छाँव तले
खुद में पराया दर्द सा पाले
कुछ जागी कुछ सोई थी

इस बसंत में सखी सुना है तुमने
नीम कोंपलें फूटी थी

कोंपल छोटी बिटिया जैसी
चूनर में यौवन दबाए
झुकी झुकी आंखों से अपने
सपने बनाती मिटाती थी

इस बसंत में सखी सुना है तुमने
नीम कोंपलें फूटी थी

पत्ती ने फिर ओंस जनी
हीरे मोती सी सहेजे उसको
बिटिया झुलसती जेठ धूप में
दर दर पानी भटकती रही

इस बसंत में सखी सुना है तुमने
नीम कोंपलें फूटी थी

उभरे कंगूरों से सजकर
दवा हवा में घुलती रही
नीम नहीं बिटिया भी मेरी
हर दिन पतझड़ सहती रही

इस बसंत में सखी सुना है तुमने
नीम कोंपलें फूटी थी
- अन्तरा करवड़े
Antara Karvade
Email : [email protected]
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अनुवाद ~ प्रियदर्शन

नेक बने मनुष्य
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जिन्हें हम जानते हैं।

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होलोकॉस्ट में एक कविता
~ प्रियदर्शन

लेकिन इस कंकाल सी लड़की के भीतर एक कविता बची हुई थी-- मनुष्य के विवेक पर आस्था रखने वाली एक कविता। वह देख रही थी कि अमेरिकी सैनिक वहाँ पहुँच रहे हैं। इनमें सबसे आगे कर्ट क्लाइन था। उसने उससे पूछा कि वह जर्मन या अंग्रेजी कुछ बोल सकती है? गर्डा बताती है कि वह 'ज्यू' है। कर्ट क्लाइन बताता है कि वह भी 'ज्यू' है। लेकिन उसे सबसे ज़्यादा यह बात हैरानी में डालती है कि इसके बाद गर्डा जर्मन कवि गेटे (Goethe) की कविता 'डिवाइन' की एक पंक्ति बोलती है...

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