अप्रतिम कविताएँ
भोर का पाहुन
भोर का पाहुन दुआरे पर-
भोर वनगंधी हवाओं से किरन के फूल उतरे,
और मेरी देहरी पर कुछ अबोले शब्द बन बिखरे ।
उठो मेरी पद्मगन्धिनि उठो,
चन्दन बांह पर फैले सिवारी आबवाले,
मोरपंखी घन संभालो,
मौन अधरों पर लगी पाबंदियां अपनी उठा लो ।
अभी ठहरा हुआ है भोर का पाहुन दुआरे पर,
अभी ठहरा हुआ है बांसुरी का स्वर किनारे पर ।
उठो इस देहरी के फूल से वेणी संवारूंगा,
अनागत का सजल वरदान पलकों पर उतारूंगा ।
कि कल कोई न यह कह दे-
तुम्हारे द्वार पर उतरा हुआ जो
भोर का पाहुन अनादृत था ।
- रमानाथ शर्मा
Ramanath Sharma
Email: [email protected]
Ramanath Sharma
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विषय:
उषा काल (5)

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इस महीने :
'कुछ प्रेम कविताएँ'
प्रदीप शुक्ला


1.
प्रेम कविता, कहानियाँ और फ़िल्में
जहाँ तक ले जा सकती हैं
मैं गया हूँ उसके पार
कई बार।
इक अजीब-सी बेचैनी होती है वहाँ
जी करता है थाम लूँ कोई चीज
कोई हाथ, कोई सहारा।
मैं टिक नहीं पाता वहाँ देर तक।।

सुनो,
अबसे
..

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इस महीने :
'स्वतंत्रता का दीपक'
गोपालसिंह नेपाली


घोर अंधकार हो, चल रही बयार हो,
आज द्वार द्वार पर यह दिया बुझे नहीं।
यह निशीथ का दिया ला रहा विहान है।

शक्ति का दिया हुआ, शक्ति को दिया हुआ,
भक्ति से दिया हुआ, यह स्वतंत्रता-दिया,
रुक रही न नाव हो, ज़ोर का बहाव हो,
आज गंगधार पर यह दिया बुझे नहीं!
यह स्वदेश का दिया प्राण के समान है!
..

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इस महीने :
'युद्ध की विभीषिका'
गजेन्द्र सिंह


युद्ध अगर अनिवार्य है सोचो समरांगण का क्या होगा?
ऐसे ही चलता रहा समर तो नई फसल का क्या होगा?

हर ओर धुएँ के बादल हैं, हर ओर आग ये फैली है।
बचपन की आँखें भयाक्रान्त, खण्डहर घर, धरती मैली है।
छाया नभ में काला पतझड़, खो गया कहाँ नीला मंजर?
झरनों का गाना था कल तक, पर आज मौत की रैली है।

किलकारी भरते ..

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