अप्रतिम कविताएँ
गीत कोई कसमसाता
नील नभ के पार कोई
मंद स्वर में गुनगुनाता,
रूह की गहराइयों में
गीत कोई कसमसाता!

निर्झरों सा कब बहेगा
संग ख़ुशबू के उड़ेगा,
जंगलों का मौन नीरव
बारिशों की धुन भरेगा!

करवटें ले शब्द जागे
आहटें सुन निकल भागे,
हार आखर का बना जो
बुने किसने राग तागे!

गूँजता है हर दिशा में
भोर निर्मल शुभ निशा में,
टेर देती धेनुओं में
झूमती पछुआ हवा में!

लौटते घर हंस गाते
धार दरिया के सुनाते,
पवन की सरगोशियाँ सुन
पात पादप सरसराते!

गीत है अमरावती का
घाघरा औ' ताप्ती का,
कंठ कोकिल में छुपा है
प्रीत की इक रागिनी का!
- अनिता निहलानी
आखर - अक्षर; पछुआ - पश्चिम दिशा से आती पवन; पात - पत्ते; पादप - पौधे; अमरावती - देवभूमि; घाघरा और ताप्ती - दो नदियों के नाम
विषय:
अध्यात्म दर्शन (38)

काव्यालय को प्राप्त: 26 Jun 2019. काव्यालय पर प्रकाशित: 19 Jul 2019

***
सहयोग दें
विज्ञापनों के विकर्षण से मुक्त, काव्य के सुकून का शान्तिदायक घर... काव्यालय ऐसा बना रहे, इसके लिए सहयोग दे।

₹ 500
₹ 250
अन्य राशि
अनिता निहलानी
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ

 अबूझ है हर पल यहाँ
 एक रहस्य
 गीत कोई कसमसाता
 पुकार
 भीतर शिखरों पर रहना है
इस महीने :
'आठ वर्ष'
जया प्रसाद


रिमझिम सावन बरसा जब
अंक तुम्हें भर लायी थी
कुछ खोयी-सी, कुछ अबूझ
कुछ खुश, कुछ घबराई थी

गोल-मटोल, चार पैर पर
घर-आँगन सब नाप लिया
नन्हे वामन जैसे तुमने
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'यूंँ पति की मांँ बनते जाना'
किरण सिपानी


हर पल वीडियो दिखाकर फुसलाते जाना
और यूंँ कौरों का हलक से उतरते जाना ‌
कभी वायलिन पकड़ना, कभी झटक के रख देना
रूठना- मचलना- न नहाने की ज़िद करते रहना
कातर नजरों से मेरे हुक्म को सिर्फ तकते रहना
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
सम्पर्क करें | हमारा परिचय
सहयोग दें

a  MANASKRITI  website