अप्रतिम कविताएँ
भीतर शिखरों पर रहना है
ख़्वाब देखकर सच करना है
ऊपर ही ऊपर चढ़ना है,
जीवन वृहत्त कैनवास है
सुंदर सहज रंग भरना है!

साथ चल रहा कोई निशदिन
हो अर्पित उसको कहना है,
इक विराट कुटुंब है दुनिया
सबसे मिलजुल कर रहना है!

ताजी-खिली रहे मन कलिका
नदिया सा हर क्षण बहना है,
घाटी, पर्वत, घर या बीहड़
भीतर शिखरों पर रहना है!

वर्तुल में ही बहते-बहते
मुक्ति का सम्मन पढ़ना है,
फेंक भूत का गठ्ठर सिर से
हर पल का स्वागत करना है!

जुड़े ऊर्जा से नित रहकर
अंतर घट में सुख भरना है,
छलक-छलक जाएगा जब वह
निर्मल निर्झर सा झरना है!
- अनिता निहलानी
वृहत्त : बहुत बड़ा। वर्तुल : गोल आकार। सम्मन : आह्वान पत्र। भूत : बीता हुआ
विषय:
अध्यात्म दर्शन (38)

काव्यालय को प्राप्त: 12 Jul 2022. काव्यालय पर प्रकाशित: 2 Sep 2022

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पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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छोटे-छोटे जूते लाइन में रखे थे,
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हर स्टेशन पर कोई माँ रोई थी,
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ईंटों की दीवा ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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