ध्वनित आह्वान

बंगला मूल

ध्वनिलो आह्वान


ध्वनिलो आह्वान मधुर गम्भीर प्रभात-अम्बर-माझे,
दिके दिगन्तरे भुवन मन्दिरे शान्तिसंगीत बाजे॥

हेरो गो अन्तरे अरुपसुन्दरे, निखिल संसारे परमबन्धुरे,
एसो आनन्दित मिलन-अंगने शोभन मंगल साजे॥

कलुष कल्मष विरोध विद्वेष होउक निःशेष
चित्ते होक जॉतो विघ्न अपगत नित्य कल्याणकाजे।

स्वर तरंगिया गाओ विहंगम, पूर्वपश्चिम बन्धु-संगम,
मैत्री-बन्धन पुण्य-मन्त्र पवित्र विश्वसमाजे॥

- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

हिन्दी गीतान्तर

ध्वनित आह्वान


ध्वनित आह्वान, गहन सुमधुर, नित प्रभात-आकाश में।
दिग्-दिगन्तर, भुवन-मन्दिर, शान्ति-स्वर गुञ्जारें॥

निरखो उर में अरूप सुन्दर, निखिल जग में परम बान्धव।
आओ मुद-मन मिलन-आँगन, रुचिर मंगल साज में॥

कलुष, द्वेष, विरोध, कल्मष, शेष होवें, हों वे निर्मल,
चित्त् के हों विघ्न अपगत, नित्य मंगल-काज में।

गाओ ये स्वर, हे विहंगम! पूर्व-पश्चिम-बंधु-संगम,
मैत्री-बन्धन पुण्य-मंत्र पवित्र विश्वसमाज में॥

- दाऊलाल कोठारी (हिन्दी गीतान्तर)

- रवीन्द्रनाथ ठाकुर
- अनुवाद: दाऊलाल कोठारी
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शिखा गुप्ता


चंदा की धरती पर मुझ सी
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मैं भी वहीं से आयी हूँ
मेरी मम्मी कहती हैं।
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'कोयल का सितार'
अशोक चक्रधर


एक बार वह उड़ते उड़ते, उड़ते ही उड़ते मस्ती में,
जंगल के कुछ बाहर आकर, पहुँची अनजानी बस्ती में।

बस्ती में टीले के ऊपर, सुन्दर सा इक छोटा घर था,
गूँज रहा संगीत जहाँ पर, लहराता सितार का स्वर था।

जैसे कोई जादू कर दे, जैसे चुम्बक लोहा खींचे,
उस सितार की स्वरलहरी से, खिंचकर कोयल आई नीचे।
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शुक्रवार 23 नवम्बर को

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