अप्रतिम कविताएँ
चल पथिक तू हौले से
टहल रहा गर भोर से पहले
पग तू रखना धीरे से
जगे हुए हैं जीव-जंतु
मानव तुमसे पहले से

खरगोश, कीट और खग निकले
नीड़, बिल, कुंड से खुल के
चंचल अबोध छौने संग
चली हिरन निर्भयता  से

दिन भर रहते सिकुड़ समेटे
वनस्पति में रुल छिपके
निर्भीक निडर और मस्त रहे वो
केवल ब्रह्म-मुहूरत  में

होगा खाद्य श्रृंखला के
प्रथम पग पर तू जग के
व्याध का खेल रचा यहाँ पर
सुन्दर सूक्ष्म-संतुलन से

कोमल कोंपल मृदुल पत्ते
गीली घास धुले नम से
चन्द्रमा और सूर्य किरण संग
रचा भव्य रूपक नभ में

दर्शन करना गर तू चाहे
ऐसे स्वप्निल मन्ज़र के
सांस भी आये मद्धम तेरी
पग तू रखना धीरे से
- प्रिया एन. अइयर
व्याध : शिकारी

काव्यालय को प्राप्त: 5 Jul 2017. काव्यालय पर प्रकाशित: 8 Jan 2021

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 अधूरी
 चल पथिक तू हौले से
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इस महीने :
'कहीं कुछ भी उथला न रह जाए'
ज्योति चावला


इन दिनों मैं डूब-उतरा रही हूँ
अपने ही भीतर के पानी में
ऐसे जैसे एक प्याला हो मेरी देह और
चाय पत्ती के सैशे-सा मेरा व्यक्तित्व
डूब और उतरा रहा है अपने ही भीतर कहीं

न जाने क्यूँ जितनी बार उबरती हूँ खुद से
फिर-फिर डूब जाना चाहती हूँ खुद में ही
कि सदियाँ गवाह हैं ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'तोड़ती पत्थर'
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'


वह तोड़ती पत्थर;
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर—
वह तोड़ती पत्थर।

कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;
श्याम तन, भर बँधा यौवन,
नत नयन प्रिय, कर्म-रत मन,
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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