चिर मुक्ति न दे पायी जिसको, उसको फिर बन्धन दूँ तो क्यों?
मधुमय प्रभात की बेला में,
रवि ने संध्या का किया मोल;
तब कमल दलों ने भंवरों को,
निज बन्दीगृह से दिया खोल;
तो भी मेरे भोले बन्दी!
तुम भी निज को आजाद करो;
फिर साहस लेकर एक बार,
सूनी कुटिया आबाद करो!
मैं आत्म-समर्पण कर न सकी, झूठा अभिनन्दन दूँ तो क्यों?
चिर मुक्ति न दे पायी जिसको, उसको फिर बन्धन दूँ तो क्यों?
शशि-तारावलि-सा विभव जान,
तुम हाथ बढ़ाओगे कब तक?
राही दो दिन की मंजिल है—
आख़िर पछताओगे कब तक?
(विभव - वैभव)
मेरी विरक्ति में निज कल्पित
विश्वास छिपाओगे कब तक?
फिर भूली भटकी भूलों की
उलझन सुलझाओगे कब तक?
जिससे आकर्षित हो न सकी, उसको आकर्षण दूँ तो क्यों ?
चिर मुक्ति न दे पायी जिसको, उसको फिर बन्धन दूँ तो क्यों?
क्यों जीवन अभिनय का सहसा
कर दिया मुझे ही सूत्रधार?
मेरे इन कंपित हाथों में
नायक कब है साहस अपार?
लो शून्य यवनिका के पीछे
नेपथ्य किसी से बोल उठा :
'क्षण में होना है पटाक्षेप --
अंतिम निर्णय, अंतिम पुकार।'
(यवनिका - पर्दा; पटाक्षेप - समाप्ति)
जब बन न भूमिका ही पायी, फिर पट परिवर्तन हूँ क्यों?
चिर मुक्ति न दे पायी जिसको, उसको फिर बन्धन दूँ क्यों?
तुम देनेवाले बने रहे
मैं लेनेवाली बन न सकी;
तुम बन करुणा का स्रोत बहे
मैं उसका जीवन बन न सकी;
अपनी टूटी नौका लेकर
तुम तूफानों में उतर पड़े;
लेकर के तुम उत्सर्ग गये
मैं मौन विसर्जन बन न सकी।
(उत्सर्ग - त्याग, बलिदान)
जिसको अबतक अपना न सकी, उसको अपनापन दूँ तो क्यों?
चिर मुक्ति न दे पायी जिसको, उसको फिर बन्धन दूँ तो क्यों?
निश्चित सुख-दुख की सीमाएँ,
आशा का होता अन्त नहीं;
किस जीवन पतझड़ में आता,
हँस-हँस कर पुनः बसन्त नहीं?
यह तो अनन्त की राह पथिक,
कब अपने, अपने रहे सदा?
कल्पना सत्य हो जाती है,
कब सपने, सपने रहे सदा?
भगवान न जिसकी बन पायी, फिर पूजा अर्चन लूँ तो क्यों?
चिर-मुक्ति न दे पायी जिसको, उसको फिर बन्धन दूँ तो क्यों?
जब दीपावलि की प्रथम-ज्योति
अपनी ही लय में हुई लीन;
तब नीरव-नयनों के आगे
आयी किसकी प्रतिमा-मलिन?
मैं बोली पुण्य-पुजारी अब
भूलो तुम फूलों की सुस्मृति;
लो भस्म लगाते बढ़ जाओ
यह इसकी इति, इसकी निष्कृति।
(इति - अन्त; निष्कृति - निस्तार)
तुमने तो रोली चाही थी, बदले में चन्दन दूँ तो क्यों?
चिर-मुक्ति न दे पायी जिसको उसको फिर बन्धन दूँ तो क्यों?