अप्रतिम कविताएँ
अथाह
दुःख में, दुखों के गर्भ में,
सुख के अनछुए सन्दर्भ में,
आयु है क्या, क्या आंकलन,
न समय, न समय का ही स्मरण |
थाह पा लूँ, यदि इस अथाह की,
तो इस चंचल चिरायु चाह की,
गति को अपनी गति मिले,
चाहे भाव मिले या क्षति मिले |
इस कोमल कल्पना को तोलकर,
भाव शब्दों में बोलकर,
चिरनिद्रा मृत्यु कि पा लूँ मैं
दुखों को छंद दे, गा लूं मैं,
यही आस है, यही कामना,
शीघ्र हो अथाह से सामना |
- चेतना पंत
Chetna Pant
Email: [email protected]
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विषय:
जीवन (37)
विस्तार (13)

काव्यालय को प्राप्त: 1 Jan 1997. काव्यालय पर प्रकाशित: 1 Jan 1997

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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