बरसों के बाद कहीं
बरसों के बाद कभी
हमतुम यदि मिलें कहीं,
देखें कुछ परिचित से,
लेकिन पहिचानें ना।

याद भी न आये नाम,
रूप, रंग, काम, धाम,
सोचें,
यह सम्मभव है -
पर, मन में मानें ना।

हो न याद, एक बार
आया तूफान, ज्वार
बंद, मिटे पृष्ठों को -
पढ़ने की ठाने ना।

बातें जो साथ हुई,
बातों के साथ गयीं,
आँखें जो मिली रहीं -
उनको भी जानें ना।
- गिरिजाकुमार माथुर
काव्यपाठ: विनोद तिवारी

***
इस महीने
'वहीं से'
ओम प्रभाकर


हम जहाँ हैं
वहीं से आगे बढ़ेंगे।
देश के बंजर समय के
बाँझपन में
याकि अपनी लालसाओं के
अंधेरे सघन वन में ...
पूरी रचना यहाँ पढें...
इस महीने
'सोच में सीलन बहुत है'
सीमा अग्रवाल


सोच में सीलन बहुत है
सड़ रही है,
धूप तो दिखलाइये

कीच से लिपटे हुए है
तर्क सारे
आप पर, माला बनाकर
जापते हैं
...
पूरी रचना यहाँ पढें...
इस महीने की अगली प्रस्तुति
शुक्रवार 22 सितम्बर को

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